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सूर्य की किरणों और रंग से किसी भी बिमारी का इलाज करें

हेल्लो दोस्तों आज मैं आपको कुछ नया ज्ञान देने की कोशिश करूँगा जो आपने पहले कहीं से भी नहीं लिया होगा. दोस्तों सूर्य की किरणों से क्या कोई बिमारी ठीक हो सकती है लेकिन आज एक ऐसा ही तरीका मैं आपके साथ शेयर करूँगा.



सूर्य किरण और रंग चिकित्सा


क्रोमोपैथी क्या है?


सूर्य किरण और रंग चिकित्सा एक पुरानी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है । जिसके अन्तर्गत आयुर्वेद पद्धति के मूल सिद्धान्त वात, पित्त तथा कफ की तरह ही शरीर में रंगों के घटने-बढ़ने से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है । रोग ज्ञात होने पर जिस रंग की शरीर में कमी हो उस रंग के पूर्ण हो जाने पर रोगों से छुटकारा पाया जाता है । इन रंगों की उत्पत्ति के मूल स्रोत भगवान सूर्य स्वयं हैं । सूर्य की तेजस्विनी किरणें भिन्न-भिन्न रंगों को लिये हुए होती हैं । जिनको उसी रंग की पारदर्शी बोतलों में जल के द्वारा अवशोषित किया जाता है ।


जिस रंग की बोतल होती है सूर्य की उसी रंग की ही किरणें कांच की बोतल में भरे जल को अपने रंग से परिपूर्ण कर अपने चिकित्सकीय गुण छोड़ देती हैं। जिसके कारण वह जल साधारण जल न होकर एक औषधि के रूप में तैयार हो जाता है । यद्यपि यह जल हमें अन्य पानी की तरह दिखने में साधारण ही लगता है परन्तु जिस रंग की बोतल में यह सूर्य की रोशनी में चार्ज किया हुआ होता है उस रंग के पूर्ण चिकित्सकीय गुण इसमें समाहित होते हैं तथा यह हमारे शरीर में अपने गुणों के अनुसार प्रभाव भी करता है । जब चिकित्सक को इन रंगों के गुण व दोषों के बारे में पूर्ण जानकारी हो जाती है तो जांच के अनुसार हर रोगी के शरीर में जिस रंग की कमी या अधिकता होती है उस रंग का संतुलन कर देता है? जिससे हमारे शरीर में निर्दिष्ट रोग स्वतः ही ठीक हो जाता है ।


इसलिए सूर्य किरण व रंग चिकित्सा से हम अपने स्वास्थ्य को ठीक रख सकते हैं । अपनी शक्ति को भी बढ़ा सकते हैं स्वयं का और दूसरे लोगों का प्राकृतिक नियम के अनुसार उपचार भी कर सकते हैं । यह चिकित्सा सभी जगह सुलभ व नि:शुल्क प्राप्त होती है । जिसको प्राप्त करने में किसी भी व्यक्ति को कोई कठिनाई नहीं होती है । इस चिकित्सा से असाधारण से असाधारण रोग भी ठीक किए जा सकते है । इसके लिए रोगी को अपने मनोबल और चिकित्सा पर विश्वास कायम रखना चाहिए । ताकि हम अपना स्वास्थ्य अधिक सबल तन्दुरुस्त व रोगविहीन रख सकें और समाज में एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर सकें और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत बन सके । ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ व प्रकृति के सम्पर्क में रहने वाली हो और सामाजिक बुराइयां तथा भयंकर बीमारियों का उन्मूलन हो तथा एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके । इसलिए आओ हम सब मिलकर इसे अपनायें व अपने ऋषि-मुनियों की इस धरोहर को विलुप्त न होने दें ।


सूर्य किरण और रंग चिकित्सा (क्रोमोपैथी) की उपयोगिता


महर्षि आचार्य चरक के अनुसार जिस संगति में सभी औषधियां एक संग रहती है वह सूर्य किरण और रंग चिकित्सा ही हैं। इस पद्धति की औषधियों के माध्यम से सभी रोगों से बड़ी आसानी से मुक्ति मिल जाती है।


हमारे वेदशास्त्रों में सूर्य को स्थावर तथा विश्व की आत्मा तथा मनुष्य का प्राण कहा गया है इसलिए अगर निरोगी काया की इच्छा है तो सूर्य की शरण में जाना अति उत्तम है । सूर्य वास्तव में चर-अचर जगत की आत्मा है । इस बात की पुष्टि संसार के सभी ऋषि-मुनि, आचार्य, देश विदेश के विशेषज्ञों ने की है जो इस प्रकार है-




  1. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार औषधि बनाने की विधि एकदम सरल है । उसी प्रकार सूर्य तप्त तथा सूर्य चार्ज औषधियों से बनने वाली औषधियों को बनाने की विधि एकदम सरल है ।

  2. इस पद्धति से उपचार करते समय न तो दर्द होता है और न किसी प्रकार का कोई कष्ट होता है ।

  3. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से इस पद्धति में जहरीला प्रयोग नहीं होता और न ही बुरा प्रभाव (रिएक्शन) पड़ता है।

  4. इस पद्धति में बेहोश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही चीर-फाड़ करने की आवश्यकता होती है ।

  5. उसी प्रकार जख्म और घाव का निशान तक भी नहीं पड़ता है । सूर्य की किरणों में रोगों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है ।


ऋग्वेद के अनुसार, सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से सूर्य तप्त तैयार जल ही नि:सदेह औषधि है, जल ही रोगों को दूर करने वाला है। वह जल ही तेरे लिए सहस्र औषधियों के समान है ।


इसकी सूची में प्रमुख रोग इस प्रकार है-पीलिया, सभी प्रकार के सिर के रोग, कान दर्द, बहरापन, अंधापन, शरीर की अकड़न, सभी प्रकार के बुखार, जलोदर रोग, सभी प्रकार के पेट रोग, आंखों के समस्त रोग, फेफड़ों के रोग, हड्डियों के रोग, विष का प्रभाव, वात रोग, कफ रोग, गर्मी रोग, मूत्र रोग, आँतों के रोग, यौन रोग सैक्स के सभी रोग, टी.बी. रीढ़ की हड्डी के रोग, घुटना और कूल्हे के रोग, गलने और सड़ने वाली बीमारियां और अन्य कष्टकारक रोग आदि सभी रोगों को सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से उपचार करने पर फायदा होता है ।


अथर्ववेद का कथन है कि सूर्य के प्रकाश में रहना अमृत के संग में रहने के समान है । बीमारी के बंधनों को यदि तोड़ना है तो सूर्य के प्रकाश से अपना सम्पर्क बनाए रखें । सूर्य शरीर को निरोगिता प्रदान करता है । ऋग्वेद का कहना है कि सूर्य मनुष्य को निरोगिता, दीर्घायु और समग्र सुख प्रदान करता है । एक अन्य मन्त्र में कहा गया है कि सूर्य की किरणें मनुष्य को मृत्यु से बचाती हैं ।


सूर्य किरणों में सात रंगों के गुण




  1. बैंगनी (Violet) : शीतल, लाल कणों का वर्धक, क्षय रोग का नाशक है तथा विविधता का प्रतीक है।

  2. गहरा नीला (Indigo) : शीतल, पित्त रोगों का नाशक, ज्वर नाशक तथा शान्ति प्रदान करने वाला है। सूर्य शरीर को निरोगिता प्रदान करता है।

  3. आसमानी (Blue) : शीतल, पित्त रोगों का नाशक तथा ज्वरनाशक, आशा का प्रतीक होता है।

  4. हरा (Green) : समृद्धि और बुद्धि का प्रतीक है। समशीतोष्ण, वात रोगों का नाशक और रक्त शोधक है। ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति और शीतलता का प्रतीक होता है।

  5. पीला (Yellow) : यश तथा बुद्धि का प्रतीक होता है। ऊष्ण, कफ रोगों का नाशक, हृदय और पेट रोगों का नाशक होता है। संयम, आदर्श, परोपकार का प्रतीक होता है।

  6. नारंगी (Orange) : आरोग्य तथा बुद्धि का प्रतीक है। ऊष्ण, कफ रोगों का नाशक, मानसिक रोगों में शक्तिवर्धक है तथा दैवी महत्वाकांक्षा का प्रतीक होता है।

  7. लाल (Red) : प्रेम भावना का प्रतीक होता है। अति गर्म, कफ रोगों का नाशक, उत्तेजना देने वाला और केवल मालिश के लिए उत्तम होता है।


सफेद रंग


सफेद रंग सादगी, सात्विकता, सरलता, ईमानदारी तथा सज्जनता का प्रतीक है ।


सावधानी: लाल रंग गर्मी उत्तेजना और चिड़चिड़ापन उत्पन्न करता है । इससे स्नायु विकार हो सकते हैं । इसके विपरीत नीला रंग शक्तिदायक होता है । नीले रंग के साथ स्नेह, शान्ति, प्रवृत्तियां (विशेषताएं) जुड़ती हैं तथा लाल रंग उग्रता संघर्षता का प्रतीक है ।


आप की गाड़ी में
हीटर पर लाल एवं
ठंडक पर नीला
निशान क्यों?
जी हाँ यह
क्रोमोपैथी ही है ।


गति और प्रकृति के आधार पर नीचे से ऊपर वाली किरणें क्रमश: अधिक प्रभावशाली होती हैं । जैसे- लाल से अधिक नारंगी उससे अधिक पीली और सबसे अधिक प्रभावशाली बैंगनी है । अतः बैंगनी से अधिक शक्तिशाली किरणों को पराबैंगनी किरणें कहते हैं । वास्तव में मूल रंग तीन हैं- लाल, पीला और नीला । इनके मिश्रण से ही अन्य रंग बनते हैं । जैसे- लाल और नीले से बैंगनी, नीले और सफेद से आसमानी, लाल और पीले से नारंगी ।


रंग के तीन परिवारों का महत्त्व




  1. पीला नारंगी, लाल - इन तीनों रंगों में से नारंगी रंग ही ठीक रहता है ।

  2. हरा रंग - यह रंग समशीतोष्ण होने के कारण सबसे उत्तम होता है ।

  3. बैंगनी रंग, गहरा नीला रंग और आसमानी नीला रंग इन तीन रंगों में गहरा नीला रंग ही ठीक रहता है ।


अथर्ववेद का कथन है कि सूर्य के प्रकाश में रहना अमृत के तालाब में रहने के बराबर है । बीमारी के बंधनों को यदि तोड़ना है तो सूर्य के प्रकाश से अपना सम्पर्क बनाए रखें । सूर्य शरीर को निरोगिता प्रदान करता है ।


ऋग्वेद का कहना है कि सूर्य मनुष्य को निरोगिता दीर्घायु और सारे सुख प्रदान करता है । एक अन्य मंत्र में कहा गया है कि सूर्य की किरणें मनुष्य को मृत्यु से बचाती है ।

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